देश के अन्य शहरों की तरह राजधानी में आईवीएफ तकनीक से माता-पिता बनने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। हर साल प्रदेश में 50 से ज्यादा बच्चों का जन्म इस तकनीक से हो रहा है। पहला सेंटर शुरू होने से लेकर अब तक 300 से ज्यादा बच्चों का जन्म हो चुका है।
सरकारी अस्पतालों में आईवीएफ की सुविधा नहीं है।
निजी आईवीएफ सेंटरों में महंगे खर्च और सफलता की गारंटी भी सिर्फ 30 फीसदी होने की वजह से सिर्फ धनाड्य वर्ग ही इसका लाभ उठा पा रहे हैं। इसीलिए राज्य के सबसे बड़े सरकारी अंबेडकर अस्पताल में टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर और आईवीएफ लैब खोलने का प्रस्ताव स्वास्थ्य विभाग ने राज्य शासन को भेजा है।
रायपुर मेडिकल कालेज में गायनोकालाजी एचओडी डा. ज्योति जायसवाल के अनुसार अंबेडकर अस्पताल में ऐसे कई केस आ रहे हैं, जिनमें महिलाओं को आईवीएफ की सलाह हमें देनी पड़ती है। शासन स्तर पर आईवीएफ सेंटर को मान्यता नहीं है। इसके कारण हम पेशेंट को रेफर नहीं कर पाते। ऐसे मामलों में सरकारी मदद का भी प्रावधान नहीं है।
आज की लाइफस्टाइल और अन्य चीजों को देखते हुए निकट भविष्य में यह शासन की प्राथमिकता का विषय बन सकता है। राजधानी में आईवीएफ तकनीक से टेस्ट ट्यूब बेबी की सुविधा शुरू होने के करीब एक दशक बाद अब बड़ी संख्या में लोग इसकी मदद से माता-पिता बन रहे हैं। रायपुर, बिलासपुर, भिलाई और अंबिकापुर जैसे बड़े शहरों में इसके लगातार खुल रहे सेंटर इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि निसंतान दंपत्तियों के माता-पिता बनने में यह तकनीक बड़ा सहारा बन रही है। इस तकनीक की मदद से शादी के दस से 15 साल बाद दंपत्ति माता-पिता बन रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार देर से हो रही शादी, लाइफस्टाइल में आए बदलाव और कई तरह के व्यसनों के कारण बहुत से लोगों को नैसर्गिक तरीके से माता-पिता बनने में मुश्किल आ रही है। ऐसे लोगों के लिए माता-पिता बनने की यह कृत्रिम तकनीक मददगार साबित हो रही है।
जानिए क्या होती है आईवीएफ तकनीक,कैसे इससे प्रेग्नेंट होती हैं
क्या है आइवीएफ तकनीक : इस तकनीक से महिलाओं के गर्भाशय में दवाओं और इंजेक्शन की मदद से सामान्य से ज्यादा अंडे पैदा किए जाते हैं। फिर सर्जरी से उन अंडों को निकाल कर प्रयोगशाला में कल्चर डिश में तैयार पति के शुक्राणुओं के साथ मिलाकर फर्टिलाइज किया जाता है। लैब में इसे दो या तीन दिन रखा जाता है। इससे बने भ्रूण को वापस महिला के गर्भ में इम्प्लांट किया जाता है। इस प्रक्रिया में करीब दो से तीन सप्ताह लग जाते हैं। बच्चेदानी में भ्रूण इम्प्लांट करने के बाद 14 दिनों में ब्लड या गर्भ से संबंधित जांच के जरिए स्थिति का पता लगाते हैं। यह प्रक्रिया जिन महिलाओं के बच्चे नहीं होते, उसके लिए की जाती है।
